ये कहानी है रंजन और संध्या की…
जिन्हें पता तो था कि उनकी मंज़िलें एक नहीं होंगी, फिर भी दोनों एक रास्ते पर उस मोड़ तक साथ चलना चाह रहे थे, जहाँ से उनकी मंज़िलें उन्हें खुद-ब-खुद अलग ना कर दें।
तो आइए, उनकी ज़िंदगी के सफ़र को शुरू करते हैं…
इसमें एक और लव स्टोरी शामिल है — रोज़ी और झसकेतन की। ये कहानी के सबसे अहम किरदार हैं —
रंजन: संध्या का प्यार, रोज़ी का इंस्टाग्राम दोस्त और झसकेतन का छोटा भाई।
रोज़ी: झसकेतन की मोहब्बत, संध्या की ख़ास सहेली और रंजन की इंस्टाग्राम दोस्त।
झसकेतन: रंजन के बड़े पापा का बेटा, रंजन का बड़ा भाई और उसका सबसे करीबी दोस्त, साथ ही रोज़ी का हमसफ़र।
संध्या: रंजन की प्रेमिका और रोज़ी की ख़ास सहेली।
कहानी की शुरुआत
संध्या और रोज़ी 11वीं की सहेलियाँ थीं, जो एक-दूसरे के काफ़ी करीब थीं। आज दोनों की दोस्ती को 5 साल पूरे हो गए थे। उनके बीच कभी कोई बात छिपती नहीं थी, दोनों एक-दूसरे को बहुत करीब से जानती थीं। अब दोनों ने कॉलेज पूरा कर लिया था, काफ़ी समय हो गया था।
एक दिन रोज़ी ने संध्या को फ़ोन करके अपनी निजी ज़िंदगी और अपने प्यार के बारे में बताया।
रोज़ी ने अपने इंस्टाग्राम वाले दोस्त की आईडी पर एक स्टोरी देखी, जिसे वो निहारती रही। बहुत सोचने और खुद से सवाल-जवाब करने के बाद, उसने हिम्मत करके रंजन से पूछ ही लिया —
“स्टोरी पर तुमने किसकी फोटो लगाई है?”
रंजन ने कहा कि स्टोरी पर लगी तस्वीर उसके दोस्त की है। रोज़ी ने “हाँ” कहा…
रंजन ने रोज़ी से पूछा — “तुमने मेरे दोस्त के बारे में क्यों पूछा?”
रोज़ी ने कहा — “बस ऐसे ही।”
इतने में रंजन रोज़ी को चिढ़ाने लगा — “कहीं तुम्हें मेरा दोस्त पसंद तो नहीं आ गया?”
रोज़ी ने मना किया, पर न जाने क्यों उसे उस लड़के के बारे में जानने की इच्छा हुई।
रोज़ी ने रंजन से उसके दोस्त का नाम पूछा।
रंजन ने बताया — “उसका नाम झसकेतन है।”
रोज़ी ने फिर पूछा — “वो कैसा लड़का है?”
रंजन ने कहा — “वो बहुत ही अच्छा लड़का है,” और उसके बारे में कई अच्छी बातें बताईं। अब ठहरा भी तो रंजन, झसकेतन का दोस्त ही… वो उसके बारे में गलत थोड़ी ना कहेगा।
रोज़ी रंजन की बातों में आ गई।
वो झसकेतन की तस्वीर से ज़्यादा रंजन द्वारा बताई गई अच्छाइयों पर फ़िदा हो गई।
रंजन रोज़ी की बातें भी समझ रहा था और उसके पूछने के ढंग से रोज़ी की भावनाओं को पढ़ चुका था।
रंजन ने कहा — “अगर तुम चाहो तो मैं तुम दोनों की बात शुरू करवा सकता हूँ।”
रोज़ी ने हामी भरी।
रंजन ने दोनों का इंट्रो और कॉन्टैक्ट करवाया। अब झसकेतन और रोज़ी की बातों का सिलसिला बढ़ता गया।
दोनों ने एक-दूसरे की पसंद-नापसंद जानीं, दोनों थोड़ा करीब आए। दोनों एक ही जाति से थे, तो शुरू से ही उनका मकसद शादी करना था।
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सच का खुलासा
कुछ दिनों बाद झसकेतन ने एक ऐसी बात बताई, जो हँसने लायक भी थी और रोज़ी के लिए थोड़ा गुस्सा दिलाने वाली भी।
वो बात ये थी कि रंजन उसका दोस्त नहीं, बल्कि उसका भाई है — सगे चाचा का बेटा।
ये सुनकर रोज़ी को हँसी भी आ रही थी और उसे बेवकूफ़ बनाए जाने का थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था।
उसने रंजन को कॉल करके बहुत सुनाया —
“मैंने तुम्हें दोस्त माना, पर तुमने सच नहीं बताया। अगर पहले पता होता तो भी क्या ही होता, तुमने झूठ क्यों बोला?”
इधर रंजन हँसे जा रहा था, क्योंकि रोज़ी गुस्से में नहीं, बल्कि मज़ाकिया अंदाज़ में ये सब कह रही थी।
रोज़ी इस बात से काफ़ी खुश थी कि उसे दोस्त जैसा एक देवर मिल रहा है, जिसके साथ खुलकर हँस-बोल सकती है, मस्ती कर सकती है, और रंजन भी उसे दोस्त की नज़र से देखेगा और समझेगा।
पहली मुलाक़ात
झसकेतन और रोज़ी की बातें लंबी चलने लगीं। झसकेतन समझदार और कामकाजी लड़का था, जिसे खाली समय सिर्फ़ रात में मिलता था। दोनों अक्सर सुबह तक बातें करते थे।
हालाँकि दोनों ने अब तक एक-दूसरे को सिर्फ़ वीडियो कॉल पर ही देखा था, पर अब वे आमने-सामने मिलना चाहते थे।
रोज़ी के घर में जनरल स्टोर था। एक दिन झसकेतन वहीं पहुँच गया। रोज़ी उत्साह में दुकान से बाहर आ गई। झसकेतन बाइक पर था, और उसे ये बात थोड़ी ठीक नहीं लगी, क्योंकि बाहर और लड़के भी थे। अगर किसी को शक हो जाता, तो पहली मुलाक़ात में ही पकड़े जाते।
झसकेतन कहीं न कहीं सही भी था — वो खुद एक लड़का था और अपनी जाति को अच्छी तरह समझता था।
लेकिन रोज़ी भी गलत नहीं थी — अपने प्यार को, जिसे आज तक उसने सामने से देखा नहीं, जिसकी पहचान भीड़ में मुश्किल थी, जिसके साथ सात जन्म गुज़ारने का सपना देखा था, जिसकी एक झलक के लिए घंटों इंतज़ार किया था… उसे देखने के लिए वो दुकान से बाहर आ ही सकती थी।
यूं दोनों ने पहली बार एक-दूसरे का दीदार किया।
प्यार और परिवार की दुविधा
अब दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ना चाहते थे। लेकिन रोज़ी को डर था कि अगर उसके घरवाले नहीं माने तो?
झसकेतन का फैसला साफ़ था — अगर लड़की उसकी जात की है, तो वो उसे भगाकर भी ले आएगा और परिवार को मना लेगा।
लेकिन रोज़ी के लिए मामला अलग था। वो भागकर शादी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उसे अपने घरवालों की इज़्ज़त प्यारी थी।
पर वो झसकेतन को छोड़ना भी नहीं चाहती थी।
एक दिन रोज़ी ने अपने कदम पीछे खींचने चाहे।
लेकिन ये सोचकर उसका दिल सहम गया कि वो झसकेतन को किसी और का होते कैसे देखेगी — जिसका फोन बिजी होते ही उसकी धड़कनें तेज़ हो जाती हैं, जिससे लड़कर भी उसी के लिए रोती है… वो झल्ली-सी लड़की अपने प्यार और परिवार के बीच फँस गई थी।
आखिरकार रोज़ी ने झसकेतन से दूरी बना ली।
झसकेतन ने भी उसका फैसला सुनकर उसे ब्लॉक कर दिया।
फिर से जुड़ाव
दोनों ने कितने सपने देखे थे — तरक्की के हर मोड़ पर साथ चलना, झगड़ा होने पर मिलकर सुलझाना, रोज़ी की बचकानी हरकतों पर मुस्कुराना, झसकेतन के गुस्से को शांत करना…
लेकिन अब सब खत्म हो गया था।
झसकेतन का फैसला सही था — अगर रोज़ी साथ नहीं दे पाएगी, तो रिश्ता टूटना तय था।
लेकिन वो अपने फैसले पर टिक नहीं पाया — 2 दिन बाद उसने रोज़ी को मैसेज किया —
“भले ही तुम मेरा साथ शादी तक ना दे पाओ, पर मैं तुम्हारे साथ वहाँ तक चलना चाहूंगा, जहाँ तक तुम चाहती हो।”
रोज़ी को भी ये बात सही लगी।
आख़िरी मोड़
अब रोज़ी सोचने लगी कि क्या वो झसकेतन को किसी और का होते देख पाएगी?
आखिरकार उसने हिम्मत दिखाई और अपनी बात भाभी को बता दी। भाभी ने उसकी माँ को बताया। रोज़ी ने झसकेतन से शादी की जिद की।
अंत में फैसला हुआ कि रोज़ी की भाभी अपने पति (रोज़ी के भाई) को समझाएंगी और रोज़ी की माँ अपने पति (रोज़ी के पिता) को समझाएंगी।
तब जाकर रोज़ी की शादी झसकेतन से हो पाएगी…
आपको क्या लगता है — रोज़ी के भैया और पिता इस शादी के लिए मानेंगे?
अब ये तो वक्त आने पर पता चलेगा…
जो भी हो, बहुत जल्द ये कहानी पूरी होगी।
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