आज की कहानी है एक ऐसे मां की, जिसने अपनी पूरी जवानी अपने बेटे के नाम कर दी।
वो चाहती तो दूसरी शादी कर सकती थीं, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। सच में, उनके त्याग के बारे में लिखना ज़रूरी है।
तो ये कहानी है हमारी कुमकुम मां की। तो ऐसा क्या हुआ कि उनको अपनी पूरी ज़िंदगी शादीशुदा होते हुए भी विधवाओं की ज़िंदगी जीनी पड़ी।
तो चलिए शुरू करते हैं…
बचपन का संघर्ष
हमारी कुमकुम मां का संघर्ष उनके पैदा होते ही शुरू हो गया था। उनके घर में माता-पिता के साथ एक छोटी बहन भी थी। हमारी कुमकुम मां घर की बड़ी बेटी थीं। घर की बड़ी बेटी हो या बड़ा बेटा, उनकी ज़िम्मेदारी बड़ी ही होती है।
वैसे तो हमारी कुमकुम मां बचपन में शांत स्वभाव की थीं, आज भी हैं, परंतु पहले काफ़ी सरल थीं, सबके हिसाब से परिस्थितियों में ढल जाती थीं। उनकी 9वीं तक की पढ़ाई उनके मामा के घर में रहकर पूरी हुई। वहां उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई, पर उनकी दिक़्क़तें उनके मामा घर से आने के बाद शुरू हो गईं। उनके घर की परिस्थिति काफ़ी दयनीय थी, दो वक्त की रोटी के लिए उनको खेतों में काम तक करना पड़ गया। वो दूसरों के खेतों में काम करने जातीं। उनकी उम्र तब 14–15 साल की थी।
कुमकुम मां आगे बताती हैं, जब वो खेतों में जातीं, तब एक टिफ़िन में बासी लेकर जातीं। यहां बासी से तात्पर्य छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भोजन से है। बासी—रात के बचे हुए चावल में पानी मिलाकर, उसे टमाटर की चटनी या सब्ज़ी के साथ खाया जाता है।
पर हमारी कुमकुम मां को सब्ज़ी तक नसीब नहीं होती थी। वो प्याज और दो हरी मिर्च और नमक के साथ खेतों में काम करने के बाद पेड़ के नीचे बैठकर खाया करती थीं। उन्होंने गरीबी के साथ भुखमरी तक देखी थी। हमारी कुमकुम मां की ज़िंदगी के 2 साल ऐसे ही रोज़ी-मज़दूरी में निकल गए।
शादी और धोखा
अब हमारी कुमकुम मां की ज़िंदगी ने नया मोड़ ले लिया था। उनकी शादी महज़ 17 साल की उम्र में, अपने गांव से 50 किमी दूर गांव में तय हुई। (गोपनीयता बनाए रखने के लिए मैंने नाम में परिवर्तन के साथ गांव के नाम का ज़िक्र नहीं किया है।)
तो हमारी कुमकुम मां की शादी हो गई। वो काफ़ी खुश थीं कि अब उनकी ज़िंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी। उनको उनके जीवन के हर मोड़, हर क़दम पर साथ देने वाला हमसफ़र मिल गया था। उनको लगा था कि वो अपनी पिछली ज़िंदगी की दयनीय स्थिति को भूलकर अपने नए गृहस्थ जीवन में प्रवेश करेंगी।
दिल में नई उमंग, खुशी के साथ हमारी कुमकुम मां ने अल्ता वाले कदमों और महकते मेहंदी के हाथों के साथ, नए जीवन की खुशी, हमसफ़र मिलने की हसरत और कई सपनों के साथ, दुल्हन जोड़े में अपने ससुराल में क़दम रखा।
शादी के एक महीने तक हमारी कुमकुम मां काफ़ी खुश थीं, मानो उनके सारे सपने पूरे हो गए हों। वो अपनी पिछली ज़िंदगी के संघर्षों को भूल चुकी थीं, जीवन में नए रास्ते उनको नज़र आ रहे थे।
पर उनकी ये खुशी ज़्यादा दिन तक नहीं रही। शादी के एक महीने बाद उनके पति की सच्चाई उनके सामने आई—उनके पति नशा-प्रेमी थे। उनको बहुत बुरी लत लगी हुई थी शराब की। अब वो हमारी कुमकुम मां पर हाथ उठाते, नशे में इतने धुत होते कि घर के राशन तक की उनको परवाह नहीं थी। हमारी कुमकुम मां, जिस भुखमरी से गुज़र कर नई ज़िंदगी में आई थीं, उसी पुरानी ज़िंदगी में धकेल दी गईं। कुमकुम मां को भूखा तक रहना पड़ जाता था।
एक बार वो अपने पति से लड़कर मायके आ गईं। घर वालों ने उनको समझाया कि अगर पति कम कमा रहा है, तो तुम भी थोड़ा कमा लिया करो। नशे में हाथ उठना आम बात है।
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क्या सच में नशे में हाथ उठना आम बात है?
वो भी उस लड़की के लिए, जिसने कभी सुख ना देखा हो, जो अपने नए हमसफ़र के साथ जीवन के सारे सफ़र तय करना चाहती थी, जिसे देख कर वो अपनी पिछली ज़िंदगी भूलना चाहती थी—उसी शख्स ने उनकी ज़िंदगी पुरानी ज़िंदगी से और भी बदतर कर दी थी। उनके पति के हाथ सिर्फ़ उन पर नहीं, बल्कि उनके सपनों पर पड़ रहे थे, जिनकी झंकार हमारी कुमकुम मां ही सुन सकती थीं।
इतना सब होने के बाद भी, सबके समझाने पर हमारी कुमकुम मां अपने पति के पास लौट गईं, उन्हें दूसरा मौका देने। लेकिन इस मौके ने हमारी कुमकुम मां की ज़िंदगी पूरी तरह से तहस-नहस कर दी। उनके पति के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। मजबूरी में आकर अपने पति के ज़ुल्म सहकर, सूजे हुए चेहरे और शरीर पर चोट के निशान लिए हुए, उन्होंने ससुराल छोड़ने का फ़ैसला कर लिया।
और ये सही भी था। जब कुमकुम मां ने ससुराल छोड़ा, तो उनको पता नहीं था कि वो पेट से हैं—उनके अंदर एक जान पल रही है। मायका आने के बाद गर्भवती होने का पता चला। इसके बाद उनकी ज़िंदगी की असली मुसीबतें शुरू हुईं। कुछ महीनों बाद उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया।
अकेली मां की जंग
उसके बाद उन्हें काफ़ी समझाया गया कि अब भी देर नहीं हुई है, वो ससुराल चली जाएं, पर हमारी कुमकुम मां ने साफ़ इंकार कर दिया। वो नहीं चाहती थीं कि अपने शराबी पति का साया उनके बेटे पर पड़े। उनको उनके कई रिश्तेदारों ने ताना मारा, इन सबको नज़रअंदाज़ कर, अपने ममता के आँचल में लिए अपने बेटे को पालने लगीं।
अपने मायके में ही रहकर, अब उनके बेटे की उम्र 3 साल की हो चुकी थी। उनकी बहन की भी शादी तय हो गई और वो ससुराल चली गईं। पर कुमकुम मां की ज़िंदगी वही थी। घर वाले, समाज वाले, सारे रिश्तेदार यही चाहते थे कि कुमकुम मां दूसरी शादी कर लें। हमारी कुमकुम मां की उम्र अभी 23 साल की ही थी। वो चाहतीं तो अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत कर सकती थीं, पर उन्होंने एक ऐसा फ़ैसला किया जो सबको सोचने पर मजबूर कर दे, और खुद को ताना मारने का मौक़ा भी लोगों को दे दे।
हमारी कुमकुम मां का फ़ैसला था कि वो दूसरी शादी नहीं करेंगी, अपनी पूरी ज़िंदगी—अपनी जवानी से लेकर बुढ़ापा तक—अपने बेटे के नाम कर देंगी। वो अपने बेटे का नाज़ुक हाथ छोड़ना नहीं चाहती थीं। उनका बेटा उनके लिए सिर्फ़ बेटा नहीं, बल्कि जीने की वजह बन चुका था, जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जवानी न्योछावर कर दी।
आत्मनिर्भर बनने का सफर
अब कुमकुम मां अपना गुज़र-बसर करने के लिए दूसरे घरों में काम करने से लेकर, चंद पैसे और कमा लेने के लिए लोगों के कपड़े तक आयरन करने का काम करतीं, जिससे उनको सिर्फ़ 5 से 10 रुपए तक ही मिलते थे। पर हमारी कुमकुम मां ने हार नहीं मानी, ज़िंदगी से और उसके बुरे हालात से लड़ती रहीं।
उसी समय आंगनबाड़ी केंद्र खुलने की योजना जारी की गई। चूंकि पिछले ज़माने में लड़कियां कम पढ़ी-लिखी होती थीं या अनपढ़ होती थीं, यहां हमारी कुमकुम मां के नसीब ने उनकी हालत को देखकर रहम कर ही दिया। उनको आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में नौकरी मिल गई। उन्होंने 2003 में इस पद को प्राप्त किया।
निरंतर संघर्ष करते हुए, उन्होंने बिना किसी की मदद लिए खुद को आत्मनिर्भर बना लिया था। अब वो अपने बेटे की परवरिश करने के लिए सक्षम हो चुकी थीं। साथ ही उन्होंने 10वीं और 12वीं की पढ़ाई ओपन स्कूल से पेपर देकर पास कर ली।
जब उनको लगा कि उनके गांव का माहौल उनके बेटे के लिए ठीक नहीं है, तब उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को खुद से अलग करके, अपने रिश्तेदार के यहां पढ़ने भेज दिया।
धन्य है वो मां, जो खुद को शिक्षित करने के साथ अपने बेटे की ज़िंदगी संवारने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। वो अपने बेटे को एक काबिल इंसान बनाना चाहती थीं। वो चाहती थीं कि उनका बेटा उनकी कुर्बानियों का हिसाब न करे, पर एक होनहार बेटा ज़रूर बने।
कुमकुम मां का शायद ये सपना भी अधूरा रह गया। उन्होंने जिस बेटे के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर दी, सारी ख़्वाहिशें त्याग दीं, उसके मुस्कान के लिए अपने हर आंसू पी गईं—वो बेटा अपनी उसी मां को समझ न पाया।
पर हमारी कुमकुम मां ने हार नहीं मानी। उनको लगा कि उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं की, अधूरी छोड़ रखी है, क्योंकि उनकी आखिरी ज़िम्मेदारी थी—अपने बेटे की शादी।
हमारी कुमकुम मां ने निरंतर कार्य और संघर्ष कर, अपने जीवन को काफ़ी हद तक सुधार लिया था। आज उनको किसी चीज़ की कमी नहीं थी। वो आत्मनिर्भर, पढ़ी-लिखी, एक समझदार महिला में से एक थीं। शायद इन्हीं वजहों से मां को त्याग की मूर्ति कहा जाता है। हमारी कुमकुम मां ने अपने बेटे के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी विधवाओं की तरह गुज़ार दी। अपने फ़ैसलों से पीछे नहीं हटीं, समाज की परवाह नहीं की। बिना किसी मर्द के सहारे, आज वो खुद के सहारे खड़ी थीं। उनको किसी मर्द के नाम की ज़रूरत नहीं है। वो आज भी स्वभाव में सादगी, सरलता और मधुरता रखती हैं।
अपने पूरे परिवार—माता-पिता समेत अपने पुत्र को—अकेले अपने दम पर संभाल कर उन्होंने खुद को साबित किया है।
ऐसी बेटी को ही एक बेटे का दर्जा मिलता है। उन्होंने घर की बड़ी बेटी होने का फ़र्ज़ भी निभाया, साथ ही आज वो एक बेहतरीन मां हैं।
आज 2024 में उन्होंने अपने बेटे की शादी कराके अपनी आखिरी ज़िम्मेदारी भी पूरी कर दी।
मुझे ऐसी महिला के बारे में लिखने पर बहुत खुशी महसूस हो रही है।
कुछ लिखा है मैंने कुमकुम मां के लिए…
तुम अकेली होकर खुद को संभाला,
अपना ही नहीं, अपने साथ अपने दम पर पूरे परिवार का पेट पाला,
बिना किसी मर्द के नाम के सहारे, खुद का अलग नाम बनाया।
अपनी पूरी ज़िंदगी परिवार के नाम कर के, अपनी जवानी बेटे के सहारे गुज़ारा।
क्या लिखूं कुमकुम मां मैं आपके लिए, आपने मुझे आज निशब्द कर डाला।
आपको नमन है मां…
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