ये है प्रदीप और दिव्या की सच्ची प्रेम कहानी, जो दोस्त थे।
हम सब चीज़ नसीब पर नहीं छोड़ सकते, कभी-कभी हमें अपने हाथों से भी इसे बनाना होता है…
दिव्या ने ना तो प्रदीप को पहले कभी देखा था — सीधे शब्दों में कहें तो उन दोनों ने एक-दूसरे को आज तक देखा भी नहीं था।
पर कहते हैं ना, हाथों की लकीरों में किसी का नाम ज़रूर लिखा होता है।
पर यहाँ तो दोनों ने कोशिश भी की थी — एक-दूसरे के नाम को अपनी हाथों की लकीरों में लिखने की..
शुरुआत
दिव्या – छत्तीसगढ़ की रहने वाली थी।
प्रदीप – झारखंड का रहने वाला।
(गोपनीयता बनाए रखने के लिए राज्यों के नामों में परिवर्तन किया गया है।)
दिव्या और प्रदीप दोनों अलग-अलग राज्यों से थे।
दोनों की मुलाकात इंस्टाग्राम पर हुई थी।
धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती गई।
हालांकि दोनों अलग-अलग राज्यों से थे, पर उनकी दोस्ती के आगे दूरी मायने नहीं रखती थी।
फासला कितना भी क्यों न हो, भावना उनकी एक थी।
दोनों घंटों एक-दूसरे से बातें करते,
अपने दिन भर का हर एक पल साझा करते।
दोनों की दोस्ती इतनी पक्की और मज़बूत हो गई थी कि
एक-दूसरे की आवाज़ सुनकर ही उनकी हालत का अंदाज़ा लग जाता।
कहने को तो दोनों दोस्त थे,
पर कहीं न कहीं प्यार पनप चुका था,
और शायद ये दोनों को पता था।
पर दोनों अपने जज़्बात न जाने किस डर की वजह से अपने होठों पर लाते-लाते रुक जाते।
शायद इस डर से कि कहीं प्यार उनकी खूबसूरत दोस्ती को खत्म न कर दे।
उन्हें डर था कि अगर प्यार खत्म हो गया, तो शायद दोस्ती भी खत्म हो जाएगी।
इसी डर से दोनों अपने जज़्बात दिल में ही दबा देते थे।
एक दिन…
इनकी दोस्ती का सिलसिला यूँ ही चलता रहा।
फिर एक दिन अचानक से दिव्या गायब हो गई।
प्रदीप से उसका कांटेक्ट खत्म सा हो गया।
प्रदीप दिव्या के गायब हो जाने की वजह जानने को तरसता रहा,
पर दिव्या का कुछ पता नहीं चला।
आख़िर प्रदीप करता भी तो क्या —
वो था ही अलग राज्य से,
जिसे दिव्या का पता तक नहीं था।
उसने तो कभी छत्तीसगढ़ तक नहीं देखा था।
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प्रदीप अफसोस करता रहा कि
आख़िर उसने दिव्या को अपने दिल की बात क्यों नहीं कही।
साथ ही वो डरता था कि कहीं दिव्या को कुछ हो न गया हो।
वो बस दिन भर सोच में डूबा रहता और
दिव्या के अचानक गायब हो जाने के कारण का अंदाज़ा लगाता रहता।
प्रदीप पूरी तरह से टूट चुका था।
उसे लगा कि उसने दिव्या को खो दिया।
ऐसे ही एक सप्ताह बीत गया…
फिर एक दिन…
एक दिन अचानक दिव्या का मैसेज आया।
प्रदीप ने सवालों की झड़ी लगा दी,
पर दिव्या ने जवाब देने से साफ़ मना कर दिया।
दिव्या ने बस इतना कहा —
“मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ, क्या तुम छत्तीसगढ़ आ पाओगे?”
प्रदीप ने कहा — “दिव्या, सब ठीक तो है?”
दिव्या ने कहा — “मैं तुम्हारा रायपुर रेलवे स्टेशन में इंतज़ार करूँगी।
हो सके तो आ जाना।”
उसने समय और तारीख भी बताई।
प्रदीप ने तुरंत कहा — “मैं पहुँच जाऊँगा।”
पहली मुलाकात
आज दिव्या रायपुर के रेलवे स्टेशन पर
एक ऐसे अजनबी का इंतज़ार कर रही थी
जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था।
मन में अजीब सी घबराहट लिए वो यात्री प्रतीक्षालय में बैठी थी।
उधर प्रदीप के मन में कई उलझनें थीं,
दिमाग में कई सवाल।
ट्रेन रायपुर स्टेशन पर रुकी।
प्रदीप ने लंबी साँस ली और ट्रेन से नीचे उतरा।
दिव्या को जैसे ही पता चला कि ट्रेन आ गई,
उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं।
प्रदीप ने मैसेज किया —
“दिव्या, मैं यात्री प्रतीक्षालय की ओर आ रहा हूँ।”
दिव्या ने रिप्लाई किया —
“मैं भी यहीं हूँ।”
अब दिव्या और प्रदीप एक-दूसरे के सामने थे।
दोनों ने अपनी दोस्ती की कद्र करते हुए हाथ मिलाया
और वही स्टेशन पर बैठकर बातें करने लगे।
सच्चाई का पल
प्रदीप ने पूछा —
“तुमने मुझे अचानक क्यों बुलाया, दिव्या?”
दिव्या ने कहा —
“मेरे पास आपसे मिलने का ये पहला और आख़िरी मौका है, प्रदीप।”
प्रदीप बोला —
“मैं कुछ समझा नहीं।”
दिव्या बोली —
“आप मुझसे पूछ रहे थे ना, मैं कहाँ गायब हो गई थी?
प्रदीप, मैं गायब नहीं हुई थी।
मेरी शादी तय हो गई है।
घरवाले मेरी शादी करना चाहते हैं,
तो मैंने सोचा कि शादी के बाद पता नहीं आपसे मिल पाऊँ या नहीं।
मैं एक बार आपसे मिलना चाहती थी,
आपको करीब से देखना चाहती थी।
मैं नहीं चाहती थी कि हमारी दोस्ती सपना बन जाए।
इसलिए मैं अपनी दोस्ती की हकीकत को जीना चाहती थी।”
ये कहते हुए दिव्या की आँखें भर आईं।
प्रदीप की आँखें भी लाल हो गईं।
वो अपने जज़्बात छिपा नहीं सका और आखिर कह ही दिया —
“दिव्या, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता… मैं तुमसे प्यार करता हूँ।
चुप था तो बस इसलिए कि कहीं हमारी दोस्ती ना टूट जाए।”
दिव्या ने तुरंत जवाब दिया —
“प्रदीप, मैं भी आपसे बहुत प्यार करती हूँ…”
दोनों एक-दूसरे को गले से लगा लेते हैं और रोने लगते हैं।
दिव्या कहती है —
“प्रदीप, अब मैं चलती हूँ।
घरवालों को शक हो जाएगा।
मैं आपसे हमेशा प्यार करती रहूँगी,
पर शायद हम एक-दूसरे के नसीब में नहीं हैं।
बहुत देर हो गई हमें हमारे रिश्ते को समझने में…”
प्रदीप बोला —
“मैं तुम्हें समझता हूँ दिव्या।
तुम हमेशा खुश रहना।
मैं अभी अपना सोशल मीडिया अकाउंट डिलीट करता हूँ,
तुम भी कर दो।
दोनों समझेंगे कि हमने एक सपना देखा था —
बहुत प्यारा, जो सुबह होते ही खत्म हो गया।”
दोनों अपने-अपने घर की ओर चल पड़ते हैं।
अंत — पर अधूरा नहीं
तभी दिव्या को एहसास होता है
कि वो शायद प्रदीप के बिना नहीं रह पाएगी।
वो ज़ोर से आवाज़ लगाती है —
“प्रदीप!”
और सच मानो, प्रदीप भी इसी आवाज़ का इंतज़ार कर रहा था।
दिव्या बोली —
“प्रदीप, आप मुझे अपने साथ ले चलिए।
वरना आप मुझे और मैं आपको हमेशा के लिए खो दूँगी।
हम सब चीज़ नसीब पर नहीं छोड़ सकते,
कभी-कभी हमें अपने हाथों से भी इसे बनाना होता है…”
प्रदीप ने कहा —
“मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा,
लेकिन उससे पहले हम एक-दूसरे की फैमिली को
एक-दूसरे के बारे में बता देते हैं,
शायद हो खुशी-खुशी मान जाएँ।”
दिव्या को भी यही सही लगा।
दोनों ने अपनी-अपनी फैमिली को फ़ोन किया
और अपने प्यार के बारे में बताया।
पर दिव्या की फैमिली नहीं मानी।
दिव्या ने कह दिया —
“मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना,
मैं प्रदीप के साथ जा रही हूँ।”
ऐसा कहकर दिव्या ने अपना सिम वहीं निकालकर तोड़ दिया
और प्रदीप का हाथ थाम लिया।
प्रदीप की फैमिली ने दिव्या को
खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।
अब वापस जाने वाली ट्रेन में
प्रदीप और दिव्या दोनों साथ थे।
जो “आख़िरी मुलाकात” बननी थी,
वो उनकी ज़िंदगी की पहली नई शुरुआत बन गई।
दोनों बहुत खुश थे।
और सच ही कहा था उन्होंने —
“हम सब चीज़ नसीब पर नहीं छोड़ सकते,
कभी-कभी हमें अपने हाथों से भी इसे बनाना होता है।”
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